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PM Modi @ 76: पीएम मोदी के दौर में कैसे बदली भारत की सभ्यतागत पहचान? काशी से ‘भारत’ तक समझिए कहानी

PM Modi @ 76: पीएम मोदी के दौर में कैसे बदली भारत की सभ्यतागत पहचान? काशी से ‘भारत’ तक समझिए कहानी
तस्वीर: prabhatkhabar.com

17 सितंबर को पीएम मोदी के जन्मदिन पर जानिए, उनके कार्यकाल में भारत की सभ्यतागत विरासत, काशी-अयोध्या जैसे तीर्थस्थलों और ‘भारत’ नाम के विमर्श को कैसे प्रमुखता मिली.

भारत की राजनीति में विकास, अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं के साथ संस्कृति और सभ्यतागत पहचान का सवाल भी लगातार महत्वपूर्ण रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह विमर्श एक अलग तरीके से सामने आया है. उनके भाषणों और सरकार की कई परियोजनाओं में भारत को केवल एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करने पर जोर दिखाई देता है.

इस दृष्टिकोण को प्रधानमंत्री के चर्चित सूत्र ‘विरासत भी, विकास भी’ में समझा जा सकता है. इसके तहत प्राचीन विरासत, धार्मिक स्थलों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और सांस्कृतिक प्रतीकों को आधुनिक विकास के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है.

काशी से अयोध्या तक, विरासत के केंद्रों का नया स्वरूप

इस बदलाव का सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण धार्मिक और सभ्यतागत महत्व वाले शहरों का पुनर्विकास है.

वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण हुआ. इसका उद्देश्य मंदिर परिसर को व्यापक सुविधाओं और आसपास के क्षेत्र से बेहतर तरीके से जोड़ना था. इसी तरह अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और उससे जुड़े व्यापक बुनियादी ढांचे का विकास राष्ट्रीय राजनीति और सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना.

काशी विश्वनाथ

उज्जैन में महाकाल लोक परियोजना ने भी मंदिर-केंद्रित शहरी विकास को एक नए रूप में सामने रखा.

इन परियोजनाओं को केवल धार्मिक स्थलों के पुनर्विकास के तौर पर नहीं देखा गया. समर्थकों के अनुसार, इनके जरिए भारत की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़े शहरों को आधुनिक सुविधाओं और पर्यटन के साथ जोड़ा गया है.

यही वह जगह है जहां ‘विरासत भी, विकास भी’ का विचार दिखाई देता है—जहां ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की कोशिश की जाती है.

नामों का बदलाव भी बना पहचान की राजनीति का हिस्सा

सभ्यतागत पुनर्स्मरण केवल स्मारकों और मंदिरों तक सीमित नहीं रहा. शहरों और सार्वजनिक स्थलों के नाम बदलने का मुद्दा भी इस विमर्श का हिस्सा बना.

इलाहाबाद का नाम प्रयागराज, राजपथ का नाम कर्तव्य पथ और मुगल गार्डन का नाम अमृत उद्यान किया गया. नई संसद के पुराने भवन को संविधान सदन के नाम से संबोधित किया जाने लगा.

इन बदलावों को समर्थक औपनिवेशिक या पुराने नामकरण से आगे बढ़कर भारतीय परंपरा और स्थानीय ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं. आलोचकों की ओर से इन फैसलों को लेकर अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक व्याख्याएं भी सामने आई हैं.

इसलिए नामों का यह बदलाव केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है. यह इस बड़े सवाल से जुड़ता है कि आधुनिक भारत अपने अतीत को किस तरह याद करता है और सार्वजनिक स्थानों पर किस तरह की ऐतिहासिक स्मृति को प्रमुखता देता है.

‘इंडिया’ के साथ ‘भारत’ का बढ़ता इस्तेमाल

प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में ‘भारत’ बनाम ‘इंडिया’ का सवाल भी राष्ट्रीय पहचान के विमर्श में प्रमुख हुआ.

जी20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राष्ट्रपति के आधिकारिक निमंत्रण में ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ जैसे प्रयोग ने इस बहस को और तेज किया. संविधान में भी ‘India, that is Bharat’ दोनों नामों को मान्यता प्राप्त है.

‘भारत’ शब्द का इस्तेमाल करने वाले पक्ष का तर्क है कि यह नाम आधुनिक गणराज्य से कहीं पुरानी सभ्यतागत निरंतरता को व्यक्त करता है.

इस नजरिए से ‘भारत’ केवल एक संवैधानिक नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक पहचान का संकेत है जिसकी जड़ें आधुनिक राष्ट्र-राज्य के निर्माण से बहुत पहले तक जाती हैं.

इतिहास के ‘कम चर्चित’ नायकों को राष्ट्रीय स्मृति में जगह

सभ्यतागत विमर्श का एक और महत्वपूर्ण पहलू ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की सार्वजनिक स्मृति है.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषणों में समय-समय पर ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और समुदायों का उल्लेख किया है जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के राष्ट्रीय आख्यान में अपेक्षाकृत कम स्थान मिलने की बात कही जाती रही है.

इनमें महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होलकर, गुरु गोबिंद सिंह, लाचित बरफुकन, राजा सुहेलदेव और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे नाम शामिल हैं.

विशेष रूप से आदिवासी और क्षेत्रीय नायकों को राष्ट्रीय इतिहास की व्यापक कहानी से जोड़ने का प्रयास इस विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

आदिवासी नायकों की स्मृति पर भी जोर

रानी दुर्गावती जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की स्मृति को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने के प्रयासों ने आदिवासी इतिहास और प्रतिरोध की कहानियों को भी सार्वजनिक चर्चा में जगह दी है.

प्रधानमंत्री मोदी ने बिरसा मुंडा सहित अनेक जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों और नायकों का उल्लेख किया है. जनजातीय गौरव दिवस की शुरुआत भी इसी व्यापक स्मृति-राजनीति के संदर्भ में देखी जाती है.

इसका एक असर यह हुआ कि आदिवासी इतिहास, स्थानीय प्रतिरोध और क्षेत्रीय नायकों की भूमिका पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बढ़ी.

सभ्यतागत पहचान और आधुनिक राष्ट्र का रिश्ता

प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल की इस विशेषता को समझने के लिए ‘सभ्यतागत राष्ट्र’ की अवधारणा महत्वपूर्ण है.

इस दृष्टिकोण में भारत की पहचान केवल 1947 के बाद बने गणराज्य से निर्धारित नहीं होती. इसके बजाय आधुनिक भारत को एक लंबी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता का वर्तमान स्वरूप माना जाता है.

यही कारण है कि मंदिर, तीर्थ, ऐतिहासिक व्यक्तित्व, पारंपरिक प्रतीक, स्थानीय विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपराएं समकालीन सार्वजनिक विमर्श में अधिक दिखाई देती हैं.

क्या बदला?

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संस्कृति और विरासत अब केवल संग्रहालयों या इतिहास की किताबों तक सीमित विषय नहीं रह गए हैं. वे पर्यटन, शहरी विकास, कूटनीति, सार्वजनिक समारोहों और राजनीतिक संवाद से भी जुड़ गए हैं.

Dr. चांदनी सेनगुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक इसे भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आत्मचेतना के पुनर्स्थापन के रूप में देखते हैं. दूसरी ओर, आलोचक इन बदलावों को लेकर अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं.

लेकिन एक बात स्पष्ट है—भारत की सभ्यतागत विरासत को आधुनिक राष्ट्र की पहचान के साथ जोड़ना प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक विमर्श की एक प्रमुख विशेषता बन चुका है.

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर उनके कार्यकाल को देखने के कई तरीके हो सकते हैं. उनमें से एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण यह भी है कि किस तरह विरासत, इतिहास और राष्ट्रीय पहचान को समकालीन भारत की राजनीतिक भाषा में नए सिरे से जगह मिली.

लेखिका के बारे में:यह लेख Dr. चांदनी सेनगुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, के द्वारा लिखा गया है.

स्रोत: यह सामग्री prabhatkhabar.com द्वारा प्रकाशित की गई थी — पूरा श्रेय मूल प्रकाशक का है।
मूल लिंक: https://www.prabhatkhabar.com/national/pm-modi-bharat-civilizational-heritage/amp
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